|| मोर्वी नंदन श्याम की जय ||

महिसागर तीर्थ स्थल का महत्व और महिमा

खाटू वाले श्याम बाबा जो महाभारत काल में वीर बर्बरीक थे | धर्म की राह में इन्होने श्री कृष्ण से अपना शीश शीश विच्छेद करा दिया | स्कंद पुराण में इनके बारे में विस्तार से बताया गया है | उसी पुराण में श्याम बाबा की तपोभूमि और सिद्धि प्राप्ति की जगह में बताया गया है | यह गुजरात में महिसागर तीर्थ स्थल के नाम से जानी जाती है |


mahisagar tirth sthal

गुजरात राज्य के बडौदा नामक नगर से 90 km दूर दक्षिण पश्चिम में कांबी कम्बोई नामक स्थान पर है | यह कुल 90 km में फैला हुआ है |


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महिसागर तीर्थ के है 2 भाग

एक भाग में कार्तिकेय द्वारा बनाया गया है स्तंभेश्वर महादेव मंदिर है जो समुन्द्र के बीच बना हुआ है | यह दिन में 2 बार समुन्द्र में समा जाता है |
जबकि दुसरे भाग में वो तपोभूमि है जो बर्बरीक और विजय के तप की प्रतीक है | विजय को इसी स्थान पर माँ कात्यायनी ने सिद्धसेन का नाम और सिद्धियाँ दी थी | और उनके हवन के रक्षक बर्बरीक को ऐसी भस्म प्रदान की थी जो बाण पर लगाकर छोड़ दी जाए तो बड़ी से बड़ी सेना भस्म हो सकती थी |



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विजय के हवन में बने थे रक्षक

स्कन्दपुराण के अनुसार हमारे खाटू वाले श्याम बाबा(श्री बर्बरीक जी) ने यहीं मगध देश से आए विजय नामक ब्राह्मण द्वारा किए जा रहे यज्ञ की रक्षा; राक्षसों का संहार कर करी एवं नवदुर्गाओं की तपस्या करी | इस तीर्थ स्थल पर श्याम बाबा बलिया देव के नाम से पूजे जाते है |


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कैसे कहलाता है महिसागर संगम ?

संगम का अर्थ है नदियों का मिलन या फिर नदी का सागर में मिलना | महिसागर संगम में मही नदी अरब सागर में मिलती है | अत: महिसागर वन यहा महिसागर संगम कहलाता है |

नारद ने पाया देवऋषि का पद

महिसागर संगम तीर्थ जहाँ श्री नारदजी 10000 (दस हजार) ऋषियों के साथ कैलाश मानसरोवर से आकर 1000(एक हजार) वर्ष तक तप किया इसके बाद यहीं पर समस्त देवताओं ने उनको देवऋषि कहकर सम्मानित किया

शनि अमावस्या के स्नान का है अत्यंत महत्व

महिसागर संगम तीर्थ शनिवार अमावस्या के दिन यहाँ स्नान करने का विशेष महत्व स्कन्द पुराण में वर्णित है

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